आओ फिर से दिया जलाएँ / अटल बिहारी वाजपेयी


आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

 

बोआई का गीत / धर्मवीर भारती


गोरी-गोरी सौंधी धरती-कारे-कारे बीज
बदरा पानी दे !
क्यारी-क्यारी गूंज उठा संगीत
बोने वालो ! नई फसल में बोओगे क्या चीज ?
बदरा पानी दे !
मैं बोऊंगा बीर बहूटी, इन्द्रधनुष सतरंग
नये सितारे, नयी पीढियाँ, नये धान का रंग
बदरा पानी दे !
हम बोएंगे हरी चुनरियाँ, कजरी, मेहँदी -
राखी के कुछ सूत और सावन की पहली तीज !
बदरा पानी दे !

समर शेष है /


वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध.

                                                
                                    —- रामधारी सिंह “दिनकर”

पतझड़ के पीले पत्तों ने



पतझड़ के पीले पत्तों ने
पतझड़ के पीले पत्तों ने
प्रिय देखा था मधुमास कभी;
जो कहलाता है आज रुदन,
वह कहलाया था हास कभी
आँखों के मोती बन-बनकर
जो टूट चुके हैं अभी-अभी
सच कहता हूँ, उन सपनों में
भी था मुझको विश्वास कभी।

आलोक दिया हँसकर प्रातः
अस्ताचल पर के दिनकर ने,
जल बरसाया था आज अनल
बरसाने वाले अम्बर ने,
जिसको सुनकर भय-शंका से
भावुक जग उठता काँप यहाँ,
सच कहता-हैं कितने रसमय
संगीत रचे मेरे स्वर ने।

तुम हो जाती हो सजल नयन
लखकर यह पागलपन मेरा,
मैं हँस देता हूँ यह कहकर
“लो टूट चुका बन्धन मेरा!”
ये ज्ञान और भ्रम की बातें-
तुम क्या जानो, मैं क्या जानूँ?
है एक विवशता से प्रेरित
जीवन सबका, जीवन मेरा!

कितने ही रस से भरे हृदय,
कितने ही उन्मद-मदिर-नयन,
संसृति ने बेसुध यहाँ रचे
कितने ही कोमल आलिंगन,
फिर एक अकेली तुम ही क्यों
मेरे जीवन में भार बनीं?
जिसने तोड़ा प्रिय उसने ही
था दिया प्रेम का यह बन्धन!

कब तुमने मेरे मानस में
था स्पन्दन का संचार किया?
कब मैंने प्राण तुम्हारा निज
प्राणों से था अभिसार किया?
हम-तुमको कोई और यहाँ
ले आया-जाया करता है,
मैं पूछ रहा हूँ आज अरे
किसने कब किससे प्यार किया?

जिस सागर से मधु निकला है,
विष भी था उसके अन्तर में,
प्राणों की व्याकुल हूक-भरी
कोयल के उस पंचम स्वर में,
जिसको जग मिटना कहता है,
उसमें ही बनने का क्रम है;
तुम क्या जानो कितना वैभव
है मेरे इस उजड़े घर में?

मेरी आँखों की दो बूँदों
में लहरें उठतीं लहर-लहर,
मेरी सूनी-सी आहों में
अम्बर उठता है मौन सिहर,
निज में लय कर ब्रह्माण्ड निखिल
मैं एकाकी बन चुका यहाँ,
संसृति का युग बन चुका अरे
मेरे वियोग का प्रथम प्रहर!

कल तक जो विवश तुम्हारा था,
वह आज स्वयं हूँ मैं अपना,
सीमा का बन्धन जो कि बना,
मैं तोड़ चुका हूँ वह सपना,
पैरों पर गति के अंगारे,
सर पर जीवन की ज्वाला है,
वह एक हँसी का खेल जिसे
तुम रोकर कह देती ‘तपना’।

मैं बढ़ता जाता हूँ प्रतिपल,
गति है नीचे गति है ऊपर;
भ्रमती ही रहती है पृथ्वी,
भ्रमता ही रहता है अम्बर!
इस भ्रम में भ्रमकर ही भ्रम के
जग में मैंने पाया तुमको,
जग नश्वर है, तुम नश्वर हो,
बस मैं हूँ केवल एक अमर.

                 —भगवती चरण वर्मा

गूंगा सूरज


गूंगा सूरज
चलते-चलते गूंगा सूरज
क्षण भर तल्ख़ तल्ख़ शब्दों में
जाने क्या क्या आज लिख गया
श्यामपट्ट पर शाम ढले।
किसी पेड़ की
दुखद मौत पर
कोई चिड़िया सिसक रही है
प्यासे प्रश्नों
के उत्तर में
नदी मौन है झिझक रही है
धूप छांव की फटी पिछौरी
ओढ़े ये अनमने मौसम
आए सूनेपन को छलने
किंतु स्वयं ही गए छले।
जले चिराग़ों की
बस्ती में
घुस आईं जंगली आँधियाँ
खड़ी कर गईं
कब्रगाह में
रोशन लम्हों की समाधियाँ
किसी सिसकती लौ के आँसू से
जब रचे गए काजल गृह
अंधकार उद्घाटन करने
रोशनियों के गाँव चले।
ठहरे हुए समय को
जब से
बारूदों ने नब्ज़ छुआ है
मौन हवा के
कटे हाथ से
रिस रिस कर के खून चुआ है
जिस्म नोच कर आसमान का
एक लोथड़ा लिए चोंच में
उतर रहे हैं गिद्ध
पसरते सन्नाटों की छाँव तले।
                      –रामानुज त्रिपाठी

सुबह




सुबह
रोशनी
के नए झरने
लगे धरती पर उतरने

क्षितिज के तट पर
धरा है
ज्योति का
जीवित घड़ा है
लगा घर-घर में नए
उल्लास का सागर उमड़ने

घना कोहरा
दूर भागे
गाँव
जागे, खेत जागे
पक्षियों का यूथ निकला
ज़िंदगी की खोज करने

धूप निकली, कली
चटकी
चल पड़ी
हर साँस अटकी
लगीं घर-दीवार पर फिर
चाह की छवियाँ उभरने

चलो, हम भी
गुनगुनाएँ
हाथ की
ताकत जगाएँ
खिले फूलों की किलक से
चलो, माँ की गोद भरने.                     –नचिकेता 

श्रीहत फूल पड़े हैं


श्रीहत फूल पड़े हैं

अंगारों के घने ढेर पर
यद्यपि सभी खड़े हैं
किन्तु दम्भ भ्रम स्वार्थ द्वेषवश
फिर भी हठी खड़े हैं

 

क्षेत्र विभाजित हैं प्रभाव के
बंटी धारणा-धारा
वादों के भीषण विवाद में
बंटा विश्व है सारा
शक्ति संतुलन रूप बदलते
घिरता है अंधियारा
किंकर्त्तव्यविमूढ़ देखता
विवश मनुज बेचारा

झाड़ कंटीलों की बगिया में
श्रीहत फूल पड़े हैं
अंगारों के बने ढेर पर …..

वन के नियम चलें नगरी में
भ्रष्ट हो गये शासन
लघु-विशाल से आतंकित है
लुप्त हुआ अनुशासन
बली राष्ट्र मनवा लेता है
सब बातें निर्बल से
यदि विरोध कोई भी करता
चढ़ जाता दल बल से

न्याय व्यवस्थ ब्याज हेतु
बलशाली राष्ट्र लड़े हैं
अंगारों के बने ढेर पर …..

दीप टिमटिमाता आशा का
सन्धि वार्ता सुनकर
मतभेदों को सुलझाया है
प्रेमभाव से मिलकर
नियति मनुज की शान्ति प्रीति है
युद्ध विकृति दानव की
सुख से रहना, मिलकर बढ़ना
मूल प्रकृति मानव की

विश्वशान्ति संदेश हेतु फिर
खेत कपोत उड़े हैं
अंगारों के बने ढेर पर …..

 

- वीरेन्द्र शर्मा

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कहते हैं तारे गाते हैं


                                                 चित्र- अनुपम चौहान 


कहते हैं तारे गाते हैं
                       कहते हैं तारे गाते हैं!
                       सन्नाटा वसुधा पर छाया,
                       नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!
                       कहते हैं तारे गाते हैं!

                       स्वर्ग सुना करता यह गाना,
                       पृथिवी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं!
                       कहते हैं तारे गाते हैं!

                       ऊपर देव तले मानवगण,
                       नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं।
                       कहते हैं तारे गाते हैं!

- हरिवंश राय बच्चन
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