अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ / राहत इन्दौरी


 

अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ
ऐसे जिद्दी हैं परिंदे के उड़ा भी न सकूँ
फूँक डालूँगा किसी रोज ये दिल की दुनिया
ये तेरा खत तो नहीं है कि जला भी न सकूँ
मेरी गैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे
उसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ
इक न इक रोज कहीं ढ़ूँढ़ ही लूँगा तुझको
ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ
फल तो सब मेरे दरख्तों के पके हैं लेकिन
इतनी कमजोर हैं शाखें कि हिला भी न सकूँ

 

 

अब खोजनी है आमरण / भारत भूषण


अब खोजनी है आमरण
कोई शरण कोई शरण

गोधुली मंडित सूर्य हूँ
खंडित हुआ वैदूर्य हूँ
मेरा करेंगे अनुसरण
किसके चरण किसके चरण

अभिजात अक्षर- वंश में
निर्जन हुए उर- ध्वंस में
कितने सहेजूँ संस्मरण
कितना स्मरण कितना स्मरण

निर्वर्ण खंडहर पृष्ठ हैं
अंतरकथाएं नष्ट हैं
व्यक्तित्व का ये संस्करण
बस आवरण बस आवरण

रतियोजना से गत प्रहर
हैं व्यंग्य- रत सुधि में बिखर
अस्पृश्य सा अंत:करण
किसका वरण किसका वरण

 

गीत बहुत बन जाएंगे / शैलेन्द्र चौहान


यूँ गीत बहुत

बन जाएंगे

लेकिन कुछ ही

गाए जाएंगे

कहीं सुगंध

और सुमन होंगे

कहीं भक्त

और भजन होंगे

रीती आँखों में

टूटे हुए सपने होंगे

बिगड़ेगी बात कभी तो

उसे बनाने के

लाख जतन होंगे

न जाने इस जीवन में

क्या कुछ देखेंगे

कितना कुछ पाएंगे

सपना बन

अपने ही छल जाएंगे

यूँ गीत बहुत

बन जाएंगे

लेकिन कुछ ही

गाए जाएंगे

 

अपनी छवि बनाई के जो मैं पी के पास गई / अमीर खुसरो


अपनी छवि बनाई के जो मैं पी के पास गई,
जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई।
छाप तिलक सब छीन्हीं रे मोसे नैंना मिलाई के
बात अघम कह दीन्हीं रे मोसे नैंना मिला के।
बल बल जाऊँ मैं तोरे रंग रिजना
अपनी सी रंग दीन्हीं रे मोसे नैंना मिला के।
प्रेम वटी का मदवा पिलाय के मतवारी कर दीन्हीं रे
मोसे नैंना मिलाई के।
गोरी गोरी बईयाँ हरी हरी चूरियाँ
बइयाँ पकर हर लीन्हीं रे मोसे नैंना मिलाई के।
खुसरो निजाम के बल-बल जइए
मोहे सुहागन किन्हीं रे मोसे नैंना मिलाई के।
ऐ री सखी मैं तोसे कहूँ, मैं तोसे कहूँ, छाप तिलक….।

 

ग़म से मिलता ख़ुशी से मिलता है / अब्दुल मजीम ‘महश्‍र’


ग़म से मिलता ख़ुशी से मिलता है
सिलसिला ज़िन्दगी से मिलता है

वैसे दिल तो सभी से मिलता है
उनसे क्यूँ आज़जी से मिलता है

है अजब जो मुझे रुलाता है
चैन दिन को उसी से मिलता है

हम जो हैं साथ ग़म उठाने को
फिर भी वह अजनबी से मिलता है

बिगड़ी बन जाएगी तेरी ‘महशर’
बे ग़रज़ गर किसी से मिलता है

 

आँगन-आँगन / धर्मवीर भारती


बरसों के बाद उसी सूने आँगन में

जाकर चुपचाप खड़े होना

रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना

मन का कोना-कोना

कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना

फिर आकर बाँहों में खो जाना

अकस्मात् मण्डप के गीतों की लहरी

फिर गहरा सन्नाटा हो जाना

दो गाढ़ी मेंहदीवाले हाथों का जुड़ना,

कँपना, बेबस हो गिर जाना

रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना

मन को कोना-कोना

बरसों के बाद उसी सूने-से आँगन में

जाकर चुपचाप खड़े होना !

धर्मवीर भारती

माँ ————- मुनव्वर राना


गले मिलने को आपस में दुआयें रोज़ आती हैं
अभी मस्जिद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं
कभी —कभी मुझे यूँ भी अज़ाँ बुलाती है
शरीर बच्चे को जिस तरह माँ बुलाती है
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
मेरा खुलूस तो पूरब के गाँव जैसा है
सुलूक दुनिया का सौतेली माओं जैसा है
रौशनी देती हुई सब लालटेनें बुझ गईं
ख़त नहीं आया जो बेटों का तो माएँ बुझ गईं
वो मैला—सा बोसीदा—सा आँचल नहीं देखा
बरसों हुए हमने कोई पीपल नहीं देखा
कई बातें मुहब्बत सबको बुनियादी बताती है
                                                      --  मुनव्वर राना 

कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए


कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए !

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है.
चालों यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए !

ना हो कमीज तो पावों से पेट ढँक लेगें,
ये लोग कितने मुनासिब है, इस सफ़र के लिए !

खुदा नहीं, न सही, आदमी का ख्वाब सही,
कोई हसीन नजारा तो है नजर के लिए !

वे मुतमईन है पत्थर पिघल नहीं सकता,
मै बेकरार हूँ आवाज में असर के लिए !

तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की,
ये एहतियात जरुरी है इस बहार के लिए !

जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मारें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए !

                                       –दुष्यंत कुमार त्यागी 

पतझड़ के पीले पत्तों ने



पतझड़ के पीले पत्तों ने
पतझड़ के पीले पत्तों ने
प्रिय देखा था मधुमास कभी;
जो कहलाता है आज रुदन,
वह कहलाया था हास कभी
आँखों के मोती बन-बनकर
जो टूट चुके हैं अभी-अभी
सच कहता हूँ, उन सपनों में
भी था मुझको विश्वास कभी।

आलोक दिया हँसकर प्रातः
अस्ताचल पर के दिनकर ने,
जल बरसाया था आज अनल
बरसाने वाले अम्बर ने,
जिसको सुनकर भय-शंका से
भावुक जग उठता काँप यहाँ,
सच कहता-हैं कितने रसमय
संगीत रचे मेरे स्वर ने।

तुम हो जाती हो सजल नयन
लखकर यह पागलपन मेरा,
मैं हँस देता हूँ यह कहकर
“लो टूट चुका बन्धन मेरा!”
ये ज्ञान और भ्रम की बातें-
तुम क्या जानो, मैं क्या जानूँ?
है एक विवशता से प्रेरित
जीवन सबका, जीवन मेरा!

कितने ही रस से भरे हृदय,
कितने ही उन्मद-मदिर-नयन,
संसृति ने बेसुध यहाँ रचे
कितने ही कोमल आलिंगन,
फिर एक अकेली तुम ही क्यों
मेरे जीवन में भार बनीं?
जिसने तोड़ा प्रिय उसने ही
था दिया प्रेम का यह बन्धन!

कब तुमने मेरे मानस में
था स्पन्दन का संचार किया?
कब मैंने प्राण तुम्हारा निज
प्राणों से था अभिसार किया?
हम-तुमको कोई और यहाँ
ले आया-जाया करता है,
मैं पूछ रहा हूँ आज अरे
किसने कब किससे प्यार किया?

जिस सागर से मधु निकला है,
विष भी था उसके अन्तर में,
प्राणों की व्याकुल हूक-भरी
कोयल के उस पंचम स्वर में,
जिसको जग मिटना कहता है,
उसमें ही बनने का क्रम है;
तुम क्या जानो कितना वैभव
है मेरे इस उजड़े घर में?

मेरी आँखों की दो बूँदों
में लहरें उठतीं लहर-लहर,
मेरी सूनी-सी आहों में
अम्बर उठता है मौन सिहर,
निज में लय कर ब्रह्माण्ड निखिल
मैं एकाकी बन चुका यहाँ,
संसृति का युग बन चुका अरे
मेरे वियोग का प्रथम प्रहर!

कल तक जो विवश तुम्हारा था,
वह आज स्वयं हूँ मैं अपना,
सीमा का बन्धन जो कि बना,
मैं तोड़ चुका हूँ वह सपना,
पैरों पर गति के अंगारे,
सर पर जीवन की ज्वाला है,
वह एक हँसी का खेल जिसे
तुम रोकर कह देती ‘तपना’।

मैं बढ़ता जाता हूँ प्रतिपल,
गति है नीचे गति है ऊपर;
भ्रमती ही रहती है पृथ्वी,
भ्रमता ही रहता है अम्बर!
इस भ्रम में भ्रमकर ही भ्रम के
जग में मैंने पाया तुमको,
जग नश्वर है, तुम नश्वर हो,
बस मैं हूँ केवल एक अमर.

                 —भगवती चरण वर्मा

गूंगा सूरज


गूंगा सूरज
चलते-चलते गूंगा सूरज
क्षण भर तल्ख़ तल्ख़ शब्दों में
जाने क्या क्या आज लिख गया
श्यामपट्ट पर शाम ढले।
किसी पेड़ की
दुखद मौत पर
कोई चिड़िया सिसक रही है
प्यासे प्रश्नों
के उत्तर में
नदी मौन है झिझक रही है
धूप छांव की फटी पिछौरी
ओढ़े ये अनमने मौसम
आए सूनेपन को छलने
किंतु स्वयं ही गए छले।
जले चिराग़ों की
बस्ती में
घुस आईं जंगली आँधियाँ
खड़ी कर गईं
कब्रगाह में
रोशन लम्हों की समाधियाँ
किसी सिसकती लौ के आँसू से
जब रचे गए काजल गृह
अंधकार उद्घाटन करने
रोशनियों के गाँव चले।
ठहरे हुए समय को
जब से
बारूदों ने नब्ज़ छुआ है
मौन हवा के
कटे हाथ से
रिस रिस कर के खून चुआ है
जिस्म नोच कर आसमान का
एक लोथड़ा लिए चोंच में
उतर रहे हैं गिद्ध
पसरते सन्नाटों की छाँव तले।
                      –रामानुज त्रिपाठी