Winter kills the poor

                                                                                                                                              Photo- The Hindu
This year, if MET department is to be believed, more than five hundred people have lost their lives due to winter. The most suffered community has been the poor and the needy in big cities who have no place to go, and they don’t have adequate ‘arrangements’ to fight the winter. 
In many northern states like Punjab, Delhi and UP mercury has dipped lower than 5 degree Celsius. Though governments of these states claim that they have spent many crores for these poor people but efforts, it seems, have remained to the papers only.
Only UP government claims that they have granted Rs 10 crores to purchase blankets, ironically this state shows 450 deaths (maximum deaths in a state so far) due to cold.
 Historically, Makar Sankranti ( A famous Hindu festival) celeberated with much fervor, marks the Sun’s entry into the northern hemisphere and the end of winter. 
But this year this has not happened. Uttar Pradesh has been the victim of weather’s extremity. There have been 450 deaths in the state, nearly 40 in Bihar, while Jammu & Kashmir, Himachal Pradesh, Punjab and Haryana are constantly under sub-zero temperatures .

Most deaths have occurred among the poor due to inadequate shelter and lack of warm clothing. Compounding the problem has been rain across North India, including Delhi, UP, Haryana, and Punjab, after which temperatures have fallen further. Amritsar remains the coldest place with minus one temperature in the north. MET department predicts that icy winds will continue to blow in from the Himalayas and there isn’t much hope of fog dissipating in a hurry either. 

Dense fog cover has been engulfing entire north from early hours of the evening and disappears only after 8.30 in the morning. Recent train accidents in near Kanpur and Tundla has raised alarm bells in the railway department and Indian Railway has released some guidelines to prevent any mishap in future. Though mercury level has gone in past two days but fog is still to say good bye. Dense fog cover in Delhi has been delaying many flights for hours and in worst case cancelling them. As many as 14 trains passing through Hapur and Moradabad has been cancelled and will be continued ony after the fog cover disappear.
Though Delhi government has arranged bonfires at many places but they are not enough to meet the demand of lakhs of poor people living in the city.
Though some NGOs and college students are contributing their wit by collecting used woolen clothes and later giving these clothes to the needy. 
But there are thousnads of other who are suffering and bearing the brunt of winter in India and we need sincere govrnments to solve the probem. Shelling out money on the name of poor and later pocketing it in their pockets is the realty we see happening daily in our country. Corrupt habits of politicians and babus will not die until citizens come out in open and taking things in their own hands to complete them on time. 
Every single person dying due to winter is a slap to the present goverenment as well as people who claim that India is prospering at rapid rate because they forget to mention that India is prospering -true, but Bharat, where our most population lives is hungry, poor and starving.
Though signs of the change are visible but it will take at least two decades to fill this disparity gap and that seems impossible. 
Contribute your bit if you feel something inside. That is the purpose of this article.


व्यंग्य एक नश्तर है

व्यंग्य एक नश्तर है
ऐसा नश्तर, जो समाज के सड़े-गले अंगों की
शल्यक्रिया करता है
और उसे फिर से स्वस्थ बनाने में सहयोग भी।
काका हाथरसी यदि सरल हास्यकवि हैं
तो उन्होंने व्यंग्य के तीखे बाण भी चलाए हैं।
उनकी कलम का कमाल कार से बेकार तक
शिष्टाचार से भ्रष्टाचार तक
विद्वान से गँवार तक
फ़ैशन से राशन तक
परिवार से नियोजन तक
रिश्वत से त्याग तक
और कमाई से महँगाई तक
सर्वत्र देखने को मिलता है।
अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

नेता का धंधा

ठाकुर ठर्रा सिंह से बोले आलमगीर
पहुँच गये वो चाँद पर, मार लिया क्या तीर?
मार लिया क्या तीर, लौट पृथ्वी पर आये
किये करोड़ों ख़र्च, कंकड़ी मिट्टी लाये
‘काका’, इससे लाख गुना अच्छा नेता का धंधा
बिना चाँद पर चढ़े, हजम कर जाता चंदा        ….काका हाथरसी
अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

मैं और मेरी आवारगी

फिरते हैं कब से दरबदर अब इस नगर अब उस नगर
एक दूसरे के हमसफ़र मैं और मेरी आवारगी
ना आशना हर रहगुज़र ना मेहरबाँ है एक नज़र
जायें तो अब जायें किधर मैं और मेरी आवारगी

हम भी कभी आबाद थे ऐसे कहाँ बरबाद थे
बिफ़िक्र थे आज़ाद थे मसरूर थे दिलशाद थे
वो चाल ऐसि चल गया हम बुझ गये दिल जल गया
निकले जला के अपना घर मैं और मेरी आवारगी

वो माह-ए-वश वो माह-ए-रूह वो माह-ए-कामिल हूबहू
थीं जिस की बातें कूबकू उस से अजब थी गुफ़्तगू
फिर यूँ हुआ वो खो गई और मुझ को ज़िद सी हो गई
लायेंगे उस को ढूँड कर मैं और मेरी आवारगी

ये दिल ही था जो सह गया वो बात ऐसी कह गया
कहने को फिर क्या रह गया अश्कों का दरिया बह गया
जब कह कर वो दिलबर गया ती लिये मैं मर गया
रोते हैं उस को रात भर मैं और मेरी आवारगी

अब ग़म उठायें किस लिये ये दिल जलायें किस लिये
आँसू बहायें किस लिये यूँ जाँ गवायें किस लिये
पेशा न हो जिस का सितम ढूँढेगे अब ऐसा सनम
होंगे कहीं तो कारगर मैं और मेरी आवारगी

आसार हैं सब खोट के इम्कान हैं सब चोट के
घर बन्द हैं सब कोट के अब ख़त्म है सब टोटके
क़िस्मत का सब ये खेल है अंधेर ही अंधेर है
ऐसे हुए हैं बेअसर मैं और मेरी आवारगी

जब हमदम-ओ-हमराज़ था तब और ही अन्दाज़ था
अब सोज़ है तब साज़ था अब शर्म है तब नाज़ था
अब मुझ से हो तो हो भी क्या है साथ वो तो वो भी क्या
एक बेहुनर एक बेसबर मैं और मेरी आवारगी.
                                           ……जावेद अख्तर

तेरे जाने के बाद

तेरे जाने के बाद दिल फिर उन्हीं रास्तों पर निकल गया है
बहुत कुछ वही है, बहुत कुछ बदल गया है
वही समंदर, वही समंदर का किनारा
और किनारे पर वही दरख़्त खड़े हैं
इन सबसे बढ़ कर रेत पर तेरे कदमों के निशान हैं
जिन पर आज भी किसी और के पैर नहीं पड़े हैं
.तेरे जाने के बाद दिल फिर उन्हीं रास्तों पे निकल गया है
                                                                   ………मासूम शायर 

एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़

एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़
इक ज़रूरत से जाता था बाज़ार
ज़ोफ-ए-पीरी से खम हुई थी कमर
राह बेचारा चलता था रुक कर
चन्द लड़कों को उस पे आई हँसी
क़द पे फबती कमान की सूझी
कहा इक लड़के ने ये उससे कि बोल
तूने कितने में ली कमान ये मोल
पीर मर्द-ए-लतीफ़-ओ-दानिश मन्द
हँस के कहने लगा कि ए फ़रज़न्द
पहुँचोगे मेरी उम्र को जिस आन
मुफ़्त में मिल जाएगी तुम्हें ये कमान
                                  —-अकबर इलाहाबादी 

उठ के कपड़े बदल

उठ के कपड़े बदल
घर से बाहर निकल
जो हुआ सो हुआ॥

जब तलक साँस है
भूख है प्यास है
ये ही इतिहास है
रख के कांधे पे हल
खेत की ओर चल
जो हुआ सो हुआ॥

खून से तर-ब-तर
कर के हर राहगुज़र
थक चुके जानवर
लड़कियों की तरह
फिर से चूल्हे में जल
जो हुआ सो हुआ॥

जो मरा क्यों मरा
जो जला क्यों जला
जो लुटा क्यों लुटा
मुद्दतों से हैं गुम
इन सवालों के हल
जो हुआ सो हुआ॥

मंदिरों में भजन
मस्ज़िदों में अज़ाँ
आदमी है कहाँ
आदमी के लिए
एक ताज़ा ग़ज़ल
जो हुआ सो हुआ।।

                                            ——निदा फाजली

हम रश्क को अपने भी गवारा नहीं करते

हम रश्क को अपने भी गवारा नहीं करते
मरते हैं वले उन की तमन्ना नहीं करते

दर पर्दा उन्हें ग़ैर से है रब्त-ए-निहानी
ज़ाहिर का ये पर्दा है कि पर्दा नहीं करते

यह बाइस-ए-नौमीदि-ए-अर्बाब-ए-हवस है
“ग़ालिब” को बुरा कहते हो अच्छा नहीं करते
                                 ——मिर्ज़ा ग़ालिब 

कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें

कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें

जीवन-सरिता की लहर-लहर,
मिटने को बनती यहाँ प्रिये
संयोग क्षणिक, फिर क्या जाने
हम कहाँ और तुम कहाँ प्रिये।

पल-भर तो साथ-साथ बह लें,
कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें।
आओ कुछ ले लें औ’ दे लें।

हम हैं अजान पथ के राही,
चलना जीवन का सार प्रिये
पर दुःसह है, अति दुःसह है
एकाकीपन का भार प्रिये।

पल-भर हम-तुम मिल हँस-खेलें,
आओ कुछ ले लें औ’ दे लें।
हम-तुम अपने में लय कर लें।

उल्लास और सुख की निधियाँ,
बस इतना इनका मोल प्रिये
करुणा की कुछ नन्हीं बूँदें
कुछ मृदुल प्यार के बोल प्रिये।

सौरभ से अपना उर भर लें,
हम तुम अपने में लय कर लें।
हम-तुम जी-भर खुलकर मिल लें।

जग के उपवन की यह मधु-श्री,
सुषमा का सरस वसन्त प्रिये
दो साँसों में बस जाय और
ये साँसें बनें अनन्त प्रिये।

मुरझाना है आओ खिल लें,
हम-तुम जी-भर खुलकर मिल लें

                                         -भगवती चरण वर्मा 

चलना हमारा काम है

चलना हमारा काम है

गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूँ दर दर खड़ा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा
जब तक न मंज़िल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है, चलना हमारा काम है।

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ, तुम मिल गईं
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है।

जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी
आशा निराशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी
गति-मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठो याम है,
चलना हमारा काम है।

इस विशद विश्व-प्रहार में
किसको नहीं बहना पड़ा
सुख-दुख हमारी ही तरह,
किसको नहीं सहना पड़ा
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है।

मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा
निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है।

साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
गति न जीवन की रुकी
जो गिर गए सो गिर गए
रहे हर दम, उसीकी सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।

फकत यह जानता
जो मिट गया वह जी गया
मूँदकर पलकें सहज
दो घूँट हँसकर पी गया
सुधा-मिश्रित गरल, वह साकिया का जाम है,
चलना हमारा काम है।

                                            – शिवमंगल सिंह सुमन