>हे प्रभु आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिए / रामनरेश त्रिपाठी


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हे प्रभो आनन्द दाता ज्ञान हमको दीजिए 
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए 
लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें 
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें 

गत हमारी आयु हो प्रभु! लोक के उपकार में 

हाथ डालें हम कभी क्यों भूलकर अपकार में

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>न चाहूं मान / राम प्रसाद बिस्मिल


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न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना
मुझे वर दे यही माता रहूँ भारत पे दीवाना

करुँ मैं कौम की सेवा पडे़ चाहे करोड़ों दुख

अगर फ़िर जन्म लूँ आकर तो भारत में ही हो आना 

लगा रहे प्रेम हिन्दी में, पढूँ हिन्दी लिखुँ हिन्दी

चलन हिन्दी चलूँ, हिन्दी पहरना, ओढना खाना

भवन में रोशनी मेरे रहे हिन्दी चिरागों की

स्वदेशी ही रहे बाजा, बजाना, राग का गाना

लगें इस देश के ही अर्थ मेरे धर्म, विद्या, धन

करुँ मैं प्राण तक अर्पण यही प्रण सत्य है ठाना

नहीं कुछ गैर-मुमकिन है जो चाहो दिल से “बिस्मिल” तुम

उठा लो देश हाथों पर न समझो अपना बेगाना


अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>सर फ़रोशी की तमन्ना / राम प्रसाद बिस्मिल


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सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।

करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बात चीत

देखता हूं मैं जिसे वो चुप तिरी मेहफ़िल में है।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।

खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद

आशिक़ों का आज झमघट कूचा-ए-क़ातिल में है।

यूं खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार बार

क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है।

अक्सर लोग इसे राम प्रसाद बिस्मिल जी की रचना बताते हैं लेकिन वास्तव में ये अज़ीमाबाद (अब पटना) के मशहूर शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी की हैं और रामप्रसाद बिस्मिल ने उनका शे’र फांसी के फंदे पर झूलने के समय कहा था।
अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>हारे थके मुसाफिर के – रामावतार त्यागी


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हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से 

मैंने अक्सर यह देखा है मेरी थकन उतर जाती है ।

कोई ठोकर लगी अचानक जब-जब चला सावधानी से 

पर बेहोशी में मंजिल तक जा पहुँचा हूँ आसानी से 

रोने वाले के अधरों पर अपनी मुरली धर देने से 

मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है ॥

प्यासे अधरों के बिन परसे, पुण्य नहीं मिलता पानी को 

याचक का आशीष लिये बिन स्वर्ग नहीं मिलता दानी को 

खाली पात्र किसी का अपनी प्यास बुझा कर भर देने से 

मैंने अक्सर यह देखा है मेरी गागर भर जाती है ॥

लालच दिया मुक्ति का जिसने वह ईश्वर पूजना नहीं है 

बन कर वेदमंत्र-सा मुझको मंदिर में गूँजना नहीं है 

संकटग्रस्त किसी नाविक को निज पतवार थमा देने से

मैंने अक्सर यह देखा है मेरी नौका तर जाती है ॥

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>समन्दरों में मुआफिक हवा चलाता है / राहत इन्दौरी


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समन्दरों में मुआफिक हवा चलाता है
जहाज़ खुद नहीं चलते खुदा चलाता है

ये जा के मील के पत्थर पे कोई लिख आये

वो हम नहीं हैं, जिन्हें रास्ता चलाता है

वो पाँच वक़्त नज़र आता है नमाजों में

मगर सुना है कि शब को जुआ चलाता है

ये लोग पांव नहीं जेहन से अपाहिज हैं

उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाता है

हम अपने बूढे चिरागों पे खूब इतराए

और उसको भूल गए जो हवा चलाता है

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ / राहत इन्दौरी


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अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ

ऐसे जिद्दी हैं परिंदे के उड़ा भी न सकूँ


फूँक डालूँगा किसी रोज ये दिल की दुनिया

ये तेरा खत तो नहीं है कि जला भी न सकूँ


मेरी गैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे

उसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ


इक न इक रोज कहीं ढ़ूँढ़ ही लूँगा तुझको

ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ


फल तो सब मेरे दरख्तों के पके हैं लेकिन

इतनी कमजोर हैं शाखें कि हिला भी न सकूँ

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

हे प्रभु आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिए / रामनरेश त्रिपाठी


हे प्रभो आनन्द दाता ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए
लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें
गत हमारी आयु हो प्रभु! लोक के उपकार में
हाथ डालें हम कभी क्यों भूलकर अपकार में

 

>देशद्रोह / वियोगी हरि


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भूलेहुँ कबहुँ न जाइए, देस-बिमुखजन पास।

देश-विरोधी-संग तें, भलो नरक कौ बास॥


सुख सों करि लीजै सहन, कोटिन कठिन कलेस।

विधना, वै न मिलाइयो, जे नासत निज देस॥


सिव-बिरंचि-हरिलोकँ, बिपत सुनावै रोय।

पै स्वदेस-बिद्रोहि कों, सरन न दैहै कोय॥

न चाहूं मान / राम प्रसाद बिस्मिल


न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना
मुझे वर दे यही माता रहूँ भारत पे दीवाना

करुँ मैं कौम की सेवा पडे़ चाहे करोड़ों दुख
अगर फ़िर जन्म लूँ आकर तो भारत में ही हो आना

लगा रहे प्रेम हिन्दी में, पढूँ हिन्दी लिखुँ हिन्दी
चलन हिन्दी चलूँ, हिन्दी पहरना, ओढना खाना

भवन में रोशनी मेरे रहे हिन्दी चिरागों की
स्वदेशी ही रहे बाजा, बजाना, राग का गाना

लगें इस देश के ही अर्थ मेरे धर्म, विद्या, धन
करुँ मैं प्राण तक अर्पण यही प्रण सत्य है ठाना

नहीं कुछ गैर-मुमकिन है जो चाहो दिल से “बिस्मिल” तुम
उठा लो देश हाथों पर न समझो अपना बेगाना

 

 

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

सर फ़रोशी की तमन्ना / राम प्रसाद बिस्मिल


 

सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।
करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बात चीत
देखता हूं मैं जिसे वो चुप तिरी मेहफ़िल में है।
ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।
खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद
आशिक़ों का आज झमघट कूचा-ए-क़ातिल में है।
यूं खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है।

 

—अक्सर लोग इसे राम प्रसाद बिस्मिल जी की रचना बताते हैं लेकिन वास्तव में ये अज़ीमाबाद (अब पटना) के मशहूर शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी की हैं और रामप्रसाद बिस्मिल ने उनका शे’र फांसी के फंदे पर झूलने के समय कहा था।

 

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया