>उदास कितने थे–गजल /अखिलेश तिवारी


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उदास कितने थे–गजल 

हम उन सवालों को लेकर उदास कितने थे

जवाब जिनके यहीं आसपास कितने थे

मिली तो आज किसी अजनबी सी पेश आई

इसी हयात को लेकर कयास कितने थे

हंसी, मज़ाक, अदब, महफिलें, सुखनगोई 

उदासियों के बदन पर लिबास कितने थे 

पड़े थे धूल में अहसास के नगीने सब 

तमाम शहर में गौहरशनाश कितने थे 

हमें ही फ़िक्र थी अपनी शिनाख्त की ‘अखिलेश’

नहीं तो चहरे जमाने के पास कितने थे

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>ज़िन्दगी़ चार कविताएँ/ कन्हैयालाल नंदन


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(एक)

रूप की जब उजास लगती है

ज़िन्दगी 

आसपास लगती है

तुमसे मिलने की चाह 

कुछ ऐसे

जैसे ख़ुशबू को

प्यास लगती है।

(दो)

न कुछ कहना 

न सुनना

मुस्कराना

और आँखों में ठहर जाना

कि जैसे 

रौशनी की

एक अपनी धमक होती है

वो इस अंदाज़ से

मन की तहों में

घुस गए

उन्हें मन की तहों ने

इस तरह अंबर पिरोया है

सुबह की धूप जैसे

हार में 

शबनम पिरोती है।

(तीन)

जैसे तारों के नर्म बिस्तर पर

खुशनुमा चाँदनी 

उतरती है

इस तरह ख्वाब के बगीचे में

ज़िन्दगी

अपने पाँव धरती है

और फिर क़रीने से

ताउम्र

सिर्फ़

सपनों के 

पर कुतरती है।

(चार)

ज़िन्दगी की ये ज़िद है

ख़्वाब बन के 

उतरेगी।

नींद अपनी ज़िद पर है

– इस जनम में न आएगी

दो ज़िदों के साहिल पर

मेरा आशियाना है

वो भी ज़िद पे आमादा

-ज़िन्दगी को

कैसे भी

अपने घर 

बुलाना है।

                             कन्हैयालाल नंदन
अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>अपनी महफ़िल से ऐसे न टालो मुझे


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अपनी महफ़िल से ऐसे न टालो मुझे
मैं तुम्हारा हूँ, तुम तो सँभालो मुझे

ज़िंदगी! सब तुम्हारे भरम जी लिए

हो सके तो भरम से निकालो मुझे

मोतियों के सिवा कुछ नहीं पाओगे

जितना जी चाहे उतना खँगालो मुझे

मैं तो एहसास की एक कंदील हूँ

जब भी चाहो बुझा लो, जला लो मुझे

जिस्म तो ख़्वाब है, कल को मिट जाएगा

रूह कहने लगी है, बचा लो मुझे

फूल बन कर खिलूँगा, बिखर जाऊँगा

ख़ुशबुओं की तरह से बसा लो मुझे

दिल से गहरा न कोई समंदर मिला

देखना हो तो अपना बना लो मुझे
                                           —    कन्हैयालाल नंदन

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया