भ्रष्टाचार और हम


जन लोकपाल बिल पर आज हर देशवासी की नज़र है| संभव है सरकार आज नहीं तो कल अन्ना हजारे और उनके साथियों की मांगे मान भी ले; परन्तु क्या सिर्फ एक बिल पास हो जाने भर से हमारे देश से भ्रष्टाचार का अंत हो पायेगा? कम से कम मैं तो इसे संभव नहीं मानता|
रिश्वतखोरी की जो लत हमारे नेताओं एवं अधिकारिओं को दशकों से पड़ी हुई है क्या उसका अंत इतना आसान है? जब तक जन मानस में इस बात का संचार न हो जाये कि किसी भी प्रकार से रिश्वत देना अक्षम्य अपराध है, तब तक शायद हम जिस आदर्श भारत का स्वपन देख रहे हैं, संभव न हो|
हमारे नेता, जो वाकपटुता में इतना निपुण है कि देश कि जनता को आज़ादी से आज तक सिर्फ सपने बेचते चले आ रहे हैं, और हम मूड-मति अपनी राजनीतिक अंधभक्ति के कारण पग पग पर छले जाते रहे हैं|
हम सभी गाहे बगाहे, रिश्वतखोरी क़ी बुराई का राग अलापते नज़र आते हैं, और स्वयं समय पड़ने पर, अपना काम निकलने के लिए मुट्ठी गर्म करने से बाज़ नहीं आते|
ग्राम पंचायत चुनावों को ही ले लीजिये, देखी हुई बात है कि, इन चुनावों में किस तरह पैसा लुटाया जाता है| लोगों को वोट के बदले कई तरह के प्रलोभन दिए जाते हैं, मसलन मुफ्त शराब, साइकलें, साड़ियाँ इत्यादि इत्यादि !
तब शायद लोग ये भूल जाते हैं, कि ये पैसा उन्ही से वसूल किया जायेगा, बस तरीका थोडा अलग होगा|
राष्ट्रीय राजनीति में कोई मुफ्त टेलिविज़न बंटवाता है तो कोई साड़ियाँ |
चुनाव आयोग क़ी कड़ी मशक्कत के बाबजूद भी अपराधियों का चुनाव लड़ना बदस्तूर जरी है| चुनावी समय आते आते, शराब एवं हथियारों क़ी तस्करी एकाएक बढ़ जाती है, और हमारे अधिकारीगण जाने कहा अपने कर्त्तव्य क़ी पूर्ति करते हैं|
यही नेता धन और शक्ति का दुष्प्रयोग करके चुनावों में विजयश्री प्राप्त करते हैं, और वे जो सच्चे हैं, सीधे है, एक वोट तक नहीं मिल पता|
क्या इस बात में कोई सन्देश नहीं? क्या ये अपराधी, जो आज हमारे नेता हैं, हमारे द्वारा नहीं चुने गए? और यदि हाँ तो फिर वर्तमान स्थति के लिए उस भ्रष्ट सरकार से ज्यादा उत्तरदायी हमलोग हैं|
कुछ भले लोगों ने एक शुभ काम का प्रारब्ध तो कर दिया है, परन्तु हम-आप के सहयोग बिना ये प्रयास, प्रयास ही न रह जाये|
आवश्यकता है, एकजुटता क़ी, समभाव क़ी| हमको ये समझना होगा, कि ये राजनीतिज्ञ हमें जाती, धर्म, मज़हब के नाम पर यूँ ही बिभाजित रखेंगे जब तक हम स्वयं इनको नकार न दें|
एक उज्जवल भविष्य हमारे इंतज़ार में है, बस कदम बढ़ाने कि आवश्यकता है|

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>उदास कितने थे–गजल /अखिलेश तिवारी


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उदास कितने थे–गजल 

हम उन सवालों को लेकर उदास कितने थे

जवाब जिनके यहीं आसपास कितने थे

मिली तो आज किसी अजनबी सी पेश आई

इसी हयात को लेकर कयास कितने थे

हंसी, मज़ाक, अदब, महफिलें, सुखनगोई 

उदासियों के बदन पर लिबास कितने थे 

पड़े थे धूल में अहसास के नगीने सब 

तमाम शहर में गौहरशनाश कितने थे 

हमें ही फ़िक्र थी अपनी शिनाख्त की ‘अखिलेश’

नहीं तो चहरे जमाने के पास कितने थे

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>ज़िन्दगी़ चार कविताएँ/ कन्हैयालाल नंदन


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(एक)

रूप की जब उजास लगती है

ज़िन्दगी 

आसपास लगती है

तुमसे मिलने की चाह 

कुछ ऐसे

जैसे ख़ुशबू को

प्यास लगती है।

(दो)

न कुछ कहना 

न सुनना

मुस्कराना

और आँखों में ठहर जाना

कि जैसे 

रौशनी की

एक अपनी धमक होती है

वो इस अंदाज़ से

मन की तहों में

घुस गए

उन्हें मन की तहों ने

इस तरह अंबर पिरोया है

सुबह की धूप जैसे

हार में 

शबनम पिरोती है।

(तीन)

जैसे तारों के नर्म बिस्तर पर

खुशनुमा चाँदनी 

उतरती है

इस तरह ख्वाब के बगीचे में

ज़िन्दगी

अपने पाँव धरती है

और फिर क़रीने से

ताउम्र

सिर्फ़

सपनों के 

पर कुतरती है।

(चार)

ज़िन्दगी की ये ज़िद है

ख़्वाब बन के 

उतरेगी।

नींद अपनी ज़िद पर है

– इस जनम में न आएगी

दो ज़िदों के साहिल पर

मेरा आशियाना है

वो भी ज़िद पे आमादा

-ज़िन्दगी को

कैसे भी

अपने घर 

बुलाना है।

                             कन्हैयालाल नंदन
अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>अपनी महफ़िल से ऐसे न टालो मुझे


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अपनी महफ़िल से ऐसे न टालो मुझे
मैं तुम्हारा हूँ, तुम तो सँभालो मुझे

ज़िंदगी! सब तुम्हारे भरम जी लिए

हो सके तो भरम से निकालो मुझे

मोतियों के सिवा कुछ नहीं पाओगे

जितना जी चाहे उतना खँगालो मुझे

मैं तो एहसास की एक कंदील हूँ

जब भी चाहो बुझा लो, जला लो मुझे

जिस्म तो ख़्वाब है, कल को मिट जाएगा

रूह कहने लगी है, बचा लो मुझे

फूल बन कर खिलूँगा, बिखर जाऊँगा

ख़ुशबुओं की तरह से बसा लो मुझे

दिल से गहरा न कोई समंदर मिला

देखना हो तो अपना बना लो मुझे
                                           —    कन्हैयालाल नंदन

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>हे प्रभु आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिए / रामनरेश त्रिपाठी


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हे प्रभो आनन्द दाता ज्ञान हमको दीजिए 
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए 
लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें 
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें 

गत हमारी आयु हो प्रभु! लोक के उपकार में 

हाथ डालें हम कभी क्यों भूलकर अपकार में

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>न चाहूं मान / राम प्रसाद बिस्मिल


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न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना
मुझे वर दे यही माता रहूँ भारत पे दीवाना

करुँ मैं कौम की सेवा पडे़ चाहे करोड़ों दुख

अगर फ़िर जन्म लूँ आकर तो भारत में ही हो आना 

लगा रहे प्रेम हिन्दी में, पढूँ हिन्दी लिखुँ हिन्दी

चलन हिन्दी चलूँ, हिन्दी पहरना, ओढना खाना

भवन में रोशनी मेरे रहे हिन्दी चिरागों की

स्वदेशी ही रहे बाजा, बजाना, राग का गाना

लगें इस देश के ही अर्थ मेरे धर्म, विद्या, धन

करुँ मैं प्राण तक अर्पण यही प्रण सत्य है ठाना

नहीं कुछ गैर-मुमकिन है जो चाहो दिल से “बिस्मिल” तुम

उठा लो देश हाथों पर न समझो अपना बेगाना


अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>सर फ़रोशी की तमन्ना / राम प्रसाद बिस्मिल


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सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।

करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बात चीत

देखता हूं मैं जिसे वो चुप तिरी मेहफ़िल में है।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।

खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद

आशिक़ों का आज झमघट कूचा-ए-क़ातिल में है।

यूं खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार बार

क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है।

अक्सर लोग इसे राम प्रसाद बिस्मिल जी की रचना बताते हैं लेकिन वास्तव में ये अज़ीमाबाद (अब पटना) के मशहूर शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी की हैं और रामप्रसाद बिस्मिल ने उनका शे’र फांसी के फंदे पर झूलने के समय कहा था।
अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>हारे थके मुसाफिर के – रामावतार त्यागी


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हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से 

मैंने अक्सर यह देखा है मेरी थकन उतर जाती है ।

कोई ठोकर लगी अचानक जब-जब चला सावधानी से 

पर बेहोशी में मंजिल तक जा पहुँचा हूँ आसानी से 

रोने वाले के अधरों पर अपनी मुरली धर देने से 

मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है ॥

प्यासे अधरों के बिन परसे, पुण्य नहीं मिलता पानी को 

याचक का आशीष लिये बिन स्वर्ग नहीं मिलता दानी को 

खाली पात्र किसी का अपनी प्यास बुझा कर भर देने से 

मैंने अक्सर यह देखा है मेरी गागर भर जाती है ॥

लालच दिया मुक्ति का जिसने वह ईश्वर पूजना नहीं है 

बन कर वेदमंत्र-सा मुझको मंदिर में गूँजना नहीं है 

संकटग्रस्त किसी नाविक को निज पतवार थमा देने से

मैंने अक्सर यह देखा है मेरी नौका तर जाती है ॥

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>समन्दरों में मुआफिक हवा चलाता है / राहत इन्दौरी


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समन्दरों में मुआफिक हवा चलाता है
जहाज़ खुद नहीं चलते खुदा चलाता है

ये जा के मील के पत्थर पे कोई लिख आये

वो हम नहीं हैं, जिन्हें रास्ता चलाता है

वो पाँच वक़्त नज़र आता है नमाजों में

मगर सुना है कि शब को जुआ चलाता है

ये लोग पांव नहीं जेहन से अपाहिज हैं

उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाता है

हम अपने बूढे चिरागों पे खूब इतराए

और उसको भूल गए जो हवा चलाता है

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया

>अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ / राहत इन्दौरी


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अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ

ऐसे जिद्दी हैं परिंदे के उड़ा भी न सकूँ


फूँक डालूँगा किसी रोज ये दिल की दुनिया

ये तेरा खत तो नहीं है कि जला भी न सकूँ


मेरी गैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे

उसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ


इक न इक रोज कहीं ढ़ूँढ़ ही लूँगा तुझको

ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ


फल तो सब मेरे दरख्तों के पके हैं लेकिन

इतनी कमजोर हैं शाखें कि हिला भी न सकूँ

अपना मंच द्वारा देशप्रेम में प्रकाशित किया गया