>देशद्रोह / वियोगी हरि


>

भूलेहुँ कबहुँ न जाइए, देस-बिमुखजन पास।

देश-विरोधी-संग तें, भलो नरक कौ बास॥


सुख सों करि लीजै सहन, कोटिन कठिन कलेस।

विधना, वै न मिलाइयो, जे नासत निज देस॥


सिव-बिरंचि-हरिलोकँ, बिपत सुनावै रोय।

पै स्वदेस-बिद्रोहि कों, सरन न दैहै कोय॥